नवजात शिशुओं की देखभाल में, गृह आधारित देखभाल का महत्वपूर्ण योगदान – सीएमओ
मऊ/ राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) के क्रियान्वयन का जनपद में मातृ एवं शिशु मृत्यु दर को कम करने में महत्वपूर्ण योगदान है। इससे स्वास्थ्य सेवाओं तक महिलाओं एवं बच्चों की पहुंच में भी निरंतर सुधार आ रहा है। टीकाकरण, प्रसव पूर्व व प्रसव के बाद जाँच-उपचार जैसी स्वास्थ्य सुविधाओं के साथ ही परिवार नियोजन साधनों के उपयोग में भी बढ़ोतरी हुई है। इन कार्यों को सहजता पूर्वक करने में स्वास्थ्य सेवा में अग्रिम पंक्ति की कार्यकर्ता आशा की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। यह जानकारी मुख्य चिकित्सा अधिकारी डा. नरेश अग्रवाल ने दी।
अपर मुख्य चिकित्सा अधिकारी स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण के नोडल डा. भैरव कुमार पांडे ने बताया कि गर्भधारण से लेकर किसके जीवन – माँ या नवजात ? जीवन के पहले कुछ वर्षों के दौरान जच्चा-बच्चा की सही देखभाल सुनिश्चित करना जरुरी होता है।
डा. भैरव पांडे ने बताया कि विभाग के गृह आधारित नवजात शिशुओं की देखभाल (एचबीएनसी) का बड़ा ही महत्व है। जिसमें आशा कार्यकर्ता गृह भ्रमण करती है। इसमें प्रथम गृह भ्रमण प्रसव के दिन एवं शेष गृह भ्रमण 3, 7, 14, 21, 28 और 42 दिनों पर की जाती है। इसमें नवजात शिशु की गृह आधारित देखभाल कार्यक्रम के तहत निगरानी की जाती है। इसमें पीएसआई इंडिया संस्था नगरीय क्षेत्र की आशाओं का संचार कौशल बढ़ानें में सहयोग दे रही है। जिससे आशाओं की कार्य कुशलता में निरंतर सुधार जारी है।
नगरी स्वास्थ्य केंद्र छोटी महरनिया दक्षिणटोला के चिकित्सा अधिक्षक डा. मुहम्मद फैजान ने बताया कि पिछले वर्ष इस केंद्र के अंतर्गत प्रशिक्षण प्राप्त 6 आशाओं ने गृह भेंट (एचबीएनसी) के दौरान लगभग 485 नवजात शिशुओं के माता-पिता से संपर्क कर परामर्श के माध्यम से देखभाल की गई।
अर्बन क्षेत्र के नगरी स्वास्थ्य केंद्र छोटी महरनिया दक्षिणटोला की आशा रंभा बताती हैं कि वह गृह भेंट के लिए जाते समय आशा डायरी, रजिस्टर, एचबीएनसी किट और एमसीपी कार्ड (मातृ एवं बाल सुरक्षा कार्ड) के साथ दवा की किट भी साथ ले जाती हैं।
नवजात शिशु के घर पहुंचने के बाद पहले अभिवादन कर घर के लोगों का हालचाल लेती हैं फिर अपने आने का उद्देश्य उन्हें भली-भांति समझाती हैं। उनसे ऐसे सवाल पूछती हैं जिसमें केवल हां या न में जवाब न हो बल्कि माता और पिता दोनों से खुल कर बातचीत कर सही जानकारी मिल सके।
आशा रंभा ने बताया कि वे पहले माता-पिता और परिवार के सदस्यों की बात पूरी तरह से ध्यान पूर्वक सुनती हैं और उन्हें अपनी बात कह लेने देती हैं, साथ ही उन्हें और अपनी बात कहने के लिए भी प्रेरित करती हैं। मुलाकात के दौरान माता-पिता दोनों से बात कही जाती है, जहां तक हो सकता है तो पिता को भी बच्चे की देखभाल के बारे में जागरूक किया जाता है। आशा रंभा बताती हैं कि 1 दिन में वह 3 से 15 घरों पर पहुंचकर उनके माता-पिता से बातचीत कर नवजात शिशुओं की देखभाल पर उन्हें जागरूक करतीं है। पिछले माह उन्होंने 4 नवजात शिशुओं का गृह भ्रमण कर उनके माता-पिता को देखभाल के लिए प्रेरित किया।
Post a Comment